Field Notes — A Reader's Poem

मेरा बनारस

A reader sent us this poem about the city that raised them — a window overlooking an old lane, the rain filling the street, the sound of the Ganga aarti carried from somewhere close. We're publishing it exactly as it arrived.

मेरे घर की खिड़की से उस गली का नज़ारा, है सब से अनोखा है सब से प्यारा, आज भी वो रस्ता मेरी आँखों में बस्ता है, सोच के वो पल मेरा दिल बचपन सा हस्ता है। वो बारिश का गिरना वो गली का भरना, ज़िद्द थी अपनी कि कीचड़ में छपाक-2 करना, आज मिट्टी के कतरे को इंसान बर्दाश्त नही करता है, वो दिन थे अनमोल, आज तो इंसान बस पैसा भरता है। उन गलियों की यादें और उनकी ठंडक का एहसास, मैं अब दूर हु उनसे पर वों है मेरे पास, शांत पानी की आहट संग गंगा-आरती आज भी जी सुनने को करता है, मेरा बनारस है ये मेरे दोस्त यहाँ इंसान सूरत से ज़्यादा सीरत पे मरता है।

✍️ मेरी क़लम से
— Ashwini Gulati

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