Field Notes — A Reader's Poem
ऐ बनारस मेरे बनारस
A second poem from the same reader — a boat crossing from one ghat to the other, the sky catching on the surface of the Ganga, and a final wish to return to Manikarnika Ghat at the end of it all. Published exactly as it arrived.
ऐ बनारस मेरे बनारस
मेरा प्यार है अनोखा तुझसे बनारस
तेरी गलियों की ठंडक तेरे रिक्शे की खटपट
मेरे दिल से जुड़ी है ओ मेरे बनारस
घाटो की दहलीज़ से जब मैं देखु बनारस
इस किनारे से उस किनारे की दूरी
नौका से जब मैं कर लूं ये पूरी
फिर वो नज़ारा जो आए उधर से
आशिक़ ही बन जाऊ मैं तेरा बनारस
गंगा की सतह पर आसमानी झलक को
ताकू मैं ऐसे जैसे उसमे भी ढूँढू बनारस
मणिकर्णिका घाट पे पहुँचूं मैं जब भी
करने को समर्पण मैं झुक जाऊ बनारस
ये सांसे इसी की अमानत रखी है
माँगे तो यही पे मैं रुक जाऊ बनारस
जियूँ मैं कही भी पर सफर के आखिरी में
मुस्कुराते हुए तेरी गंगा में मिल जाऊ बनारस
ऐ बनारस मेरे बनारस
मेरा प्यार है अनोखा तुझसे बनारस।
✍️ मेरी क़लम से
— Ashwini Gulati






